रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चांद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है।
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मै कितना पुराना हूं?
मैं चुका हूं देख मनु को जनमते—मरते
और लाखों बार तुझ—से पागलों को भी
चांदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
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